कासाङ (हिन्दी भाषामा बालकथा) – विजय चालिसे

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आज दूकान का सामान लाना ही पड़ेगा, आज ही अतिथि भी अधिक आने बाले हैं, क्या करुँ ।” माँ पड़ोस की दादी से अपनी समस्या बता रही थी ।

“पता नहीं कैसे सम्हालती हो अकेले सुवह की धूप सेकती सब्जी काटने में सहयोग करते हुए दादी ने कहा ।

कासाङ की माँ मुक्तिनाथ धाम जानेवाले अतिथियों के लिए रहने का छोटा सा लज चलाती थी । यह झरकोट गाँव बहुत ही सुन्दर था । बाबा विदेशी अतिथियों को लाने पोखरा गए हुए थे । घर में माँ और कासाङ थे । जोमसोम में कालेज न होने के कारण उसका बड़ाभाई पोखरा में ही रहकर पढ़ता था । अकेले लज चलाने में माँ को बड़ी परेशानी उठानी पड़ती थी । लज का सामान लाने के लिए पैदल चलना पड़ता था । सुबह से दोपहर हो जाती थी । जोमसोम पहुँचे–पहुँचते । “माँ ! मैं जाकर ले आउँगी सामान । क्या–क्या लाना है कह दो ।” माँ की समस्या को समझकर कासाङ ने कहा । वह समय समय पर विद्यालय बन्द होने पर घोडा लेकर जोमसोम आय जाया करती थी । सामन की खरीदारी करने में माँ की सहायता करती थी । कासाङ झारकोट के विद्यालय में छठी श्रेणी की छात्रा थी ।

“पढने कब जाओगी ?” माँ ने कासाङ की ओर संकेत किया ।

आज शनिवार है न, भूल गयी क्या ? कासाङ ने माँ की समस्या का समाधान कर दिया । शनिबार विद्यालय बन्द रहता था । “अरे हाँ तो, जाकर अच्छी तरह से सामान ले आना बेटी !” मँ ने कहा ।

कासाङ खरीदारी के सामान की सूची और पैसा लेकर जोमसोम के लिए चल पड़ी । वह घोड़े में सवार थी । कासाङ घोड़े को बहुत प्यार करती थी । इस लिए घोड़ा भी उसकी बातें मानता था ।

जोमसोम जाने वाला रास्ता काफी उतार चढ़ाव वाला था । रास्ता छोटे–छोटे पत्थरों से भरा पडा था । घोड़े का पैर फिसलने का भय भी था । देर होने पर काली गण्डकी नदी के किनारेपर ऐसी हवा बहती थी कि आदमी को भी कहीं उड़ा ले जाएगा सा होता था । चढ़ाई बाले रास्ते की धूल और नदी के किनारे का बालू उड़कर आँखों को खोलने नहीं देते थे ।

“रुको रुको… फुर्के धीरे चलो, पैर फिसल कर कहीं गिर न जाओ । ऐसा लगता था घोड़े ने कासाङ की बातें समझ ली हो और वह धीरे–धीरे चलने लगा । कासाङ घोड़े को फुर्के कहकर बुलाती थी । ढलान वाला रास्ता खत्म हो चुका था । अब वह काली गण्डकी के किनारे–किनारे चलकर जोमसोम पहुँच गयी ।

“दादा जी दश बजÞा गए । १२ बजे हवा चलने के कारण मुश्किल हो जाएगी । मेरा सामाना जल्दी दे दीजिए । “हमेशा खरीदारी करने बाले दूकान पर जाकर कासाङ ने सामान की सूची देते हुए कहा ।

“अरे आज तुम अकेली आयी हो कासाङ । ठीक है जल्दी दे दूँगा ।” दूकान के दाादा जी ही नहीं उसकी मीठी बोली के चलते कासाङ को सभी पसन्द करते और प्यार भी करते थे ।

“कासाङ सामान लेकर जल्दी–जल्दी घर की ओर चल पड़ी । एक घण्टे तक काली गण्डकी नदी के किनारे चलने के बाद घोड़ा कागबेनी की चढ़ाई चढ़ने लगा । मुक्तिनाथ आने–जाने बालों की कतार लगी हुई थी । इतनी उँची चढ़ाई की क्या कहें । इसके वावजूद भी आने–जाने वालों की कतार लगी रहती थी ।

“कितनी साहसी है यह लड़की रास्ते में अकेली चल रही है । देखो ! देखो !!” कासाङ को ऐसे रास्ते पर अकेली चलते हुए देखकर यात्री लोग उसकी सराहना करते थे ।

झारकोट से काफी नीचे खिङ्चार गाँव के ऊपर पहुँचते हीं कासाङ को एक चालीस पैंतालीस साल की महिला रास्ते में गिरी हुई दिखाई दी । साथ का आदमी बहुत परेशान लग रहा था, और कह रहा था “अब क्या करुँ…? ठण्डा तो नहीं लग गया !”

राह चलने वाले थोड़ी देर रुककर देखते और अपने रास्ते चल देते । सभी को जल्दी होने के कारण किसी को भी उनकी मदद करने का समय न था । और तो और वहीं रहने वाले लोग भी मदद करने को नहीं आए ।

“क्या हुआ दादा जी…? बिमार हैं क्या ?” कासाङ ने घोडे से उतर कर पूछा ।

“हाँ… बच्ची, ठण्ड लगने की वजह से साँस नहीं ले पा रही है और गिर गई । मदद करने वाला भी कोई नहीं है, ऊपर होटल तक लेजाने पर तो कुछ उपाय हो सकता था ।” वे बहुत चिन्तित होते हुए बोले । “चिन्ता न कीजिए दादा जी, कुछ नहीं होगा । हवा कम होने के कारण किसी किसी को उँचाई पर चढ़ते समय ऐसा होता है ।” कासाङ ने कहा । “चिन्ता न करके क्या करुँ बच्ची, इस विरान जगह पर न अस्पताल है, न मदद करने वाला कोई है ।” कासाङ के समझने पर भी उस आदमी की चिन्ता कम न हुई । “चिन्ता न करें, इनको आप मेरे घोड़े में बैठा दीजिए । मैं इन्हें ऊपर पहुँचा दूँगी । उपर जाकर आरम करने पर ठीक हो जाएँगी ।” उस छोटी बच्ची की बातों को सुनकर वे आश्वस्त हुए ।

दोनों ने मिलकर रोगी को घोड़े पर बैठाया । कासाङ ने सीधे अपने लज में ले जाकर माँ को सारी बातें बतायीं । माँ ने कुछ जड़ीबूटी पीसकर महिला को पिलाया ।

“होश आने के बाद कासाङ की माँ ने उन्हें गरम चाय पिने को दी ।” थोड़ी देर आग तापने के बाद ठीक हो जाएँगी ।” माँ ने कहाँ । सचमुच कुछ देर बाद उनकी तबीयत ठीक होने लगी ठण्ड लगने का असर औषधी ने ठीक किया, चाय और आग की गर्मी से शरीर गर्मा गया । कासाङ की मदद समय पर मिलने के कारण धीरे–धीरे वह ठीक हो गयीं ।

“अब तो शायद मैं बच जाउँगी । बच्ची ! तुम तो मेरे लिए भगवान हो । तुम अगर मदद न करती… ।” बीमार औरत ने कासाङ को गोद में लेकर कहाँ ।

“हाँ अब समझ में आया कि आदमी ही भगवान है । जो (आफत) मुसीबत में पड़े लोगों की मदद करता है, वही भगवान होता है, क्यों ?” बीमार औरत की बातों को सुनकर आदमी ने कहा ।

“हाँ भगवान का अवतार लेकर ही कासाङ ने मुझे बचाया है”, उस औरत की बातों को सुनकर कासाङ ने अपनी माँ के चेहरे में चमकती हुई खुशी देखी । – अनुवादक पुरुषाेत्तम पाेख्रेल

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