यह क्या हो गया ? (हिन्दी भाषामा किशोर कथा)

Featured हिन्दी

■ डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’

मैं गांव से आ रहा हूं । तुम्हारी मम्मी की तबियत एकदम खराब हो गई है।रोहित ने गम्भीर मुद्रा में, कालेज फील्ड में खड़े यतीश के कंधे पर हाथ रखकर कहा। यतीश का खिलखिलाता चेहरा मुरझा-सा गया ।

अभी सुबह तो मम्मी ठीक थीं। बेचारी मम्मी! उन्होंने जाने क्या बिगाड़ा है बीमारी का, जो वह उनका पीछा नहीं छोड़ती ?’ खोए-खोए से यतीश ने रोहित को धन्यवादकहकर अपने कदम तेजी से साइकिल स्टैण्ड की ओर बढ़ा दिए ।

यतीश कक्षा सात का छात्र था। वह आठ किलोमीटर दूर गांव से शहर पढ़ने आता था। सिवाय मम्मी के उसका इस दुनियाँ में और कोई न था। बोझिल मन से यतीश ने साइकिल निकाली। अपनी किताबे कैरियर में दबाई और चलता बना। मेडिकल स्टोर से कुछ दवाएं लेकर वह स्पीड में गाँव की ओर बढ़ चला।

मम्मी इस महीने तीसरी बार बीमार हुई थीं। उन्हें दमा था । जब-जब मौसम बदलता, मम्मी जरूर बीमार पड़ती थीं। अभी बारह दिन पहले ही तो उन्हें डाक्टर मेहरोत्रा के हॉस्पिटल से छुट्टी मिली थी । सांस थी कि रुकने का नाम ही न लेती थी। यतीश का ‘काटो तो खून नहीं’ वाला हाल था। माँ को कुछ हो गया तो वह …!  वैसे डॉ. मेहरोत्रा के इलाज से लाभ हुआ था और ऐसा नहीं लगता था कि मम्मी इतनी जल्दी फिर से बीमार पड़ सकती हैं। खैर, बीमारी तो बीमारी है। एक अनचाहे मेहमान की तरह कब जीवन के दरवाजे खटखटा दे, कौन जानना है ?

यह ईश्वर भी बड़ा विचित्र है। यह क्यों मेरी इतनी अच्छी मम्मी को तंग करता रहता है ? उसे मम्मी को जितने भी कष्ट देने हैं, वह सब मुझे दे दे।‘ सोचते हुए यतीश एकदम भावुक=सा हो उठा । इसी क्रम में उसके हृदय की धड़कन और साइकिल की स्पीड भी तेज हो चली थी। वह तीन-चार बार टकराते बचा था। मम्मी हमेशा समझाती थीं कि साईकिल धीरे चलाओ। पर आज तो वह… मम्मी के लिए ही तो इतना जल्दी में था।

कितनी हमदर्दी है रोहित को मुझसे । बेचारे ने गांव से आते ही मुझे मम्मी की बीमारी की खबर दी। नहीं तो भला किसे परवाह होती है किसी के दुःख की ?’

मेरे पहुंचते ही मम्मी की आधी बीमारी ठीक हो जाएगी, जानता हूं मैं… । मुझे देखकर ही तो जी रही हैं वे। कितने दुःख सहकर उन्होंने पाला है मुझे।यतीश के मस्तिष्क में तरह-तरह के विचार आ-जा रहे थे।

साइकिल आधे से ज्यादा दूरी तय कर चुकी थी। प्रकृति को अपनी विडम्बना का खेल भी आज ही दिखाना था। अचानक एक दर्दीली चीख गूंज उठी। बेचारा यतीश, वह एक ट्रक की चपेट में आ गया था।

ट्रक भागता चला गया। निर्जन सड़क पर टूटी साइकिल और बेहोश यतीश के सिवाय और कोई न था । यतीश की धीमी पड़ रही कराह में मम्मी से मिलने की तड़प थी। रिस रहा खून ढालू सड़क पर सांप की तरह रेंगता हुआ बढ़ चला ।

राहगीरों ने देखा तो एम्बुलेंस को फोन किया। तब तक पुलिस भी आ गई। यतीश को अस्पताल पहुंचाया गया। दुर्घटना की जानकारी पाते ही कालेज के प्रधानाचार्य, समस्त अध्यापक और छात्र वहां इकट्ठे हो गए।

यतीश को एमरजेंसी वार्ड में एडमिट किया गया था। किसी को भी वहां जाने की इजाजत नहीं थी। मगर इस घटना को सुनकर पागल सा हो गया रोहित चीखता – चिल्लाता वहाँ जा घुसा।

  ‘क्या हो गया यतीश तुम्हें ? तुम ठीक हो जाओगे यतीश ऽऽऽ । यतीश… तुम्हें…… कुछ नहीं होगा…, अरे  भगवान।

रोहित को बाहर निकाल लिया गया। उसकी चीखें जारी थीं।

उधर यतीश को होश में लाने का पूरा प्रयास किया जा रहा था। खून बहुत बह गया था। स्कूल के एक सर का ब्लड ग्रुप उससे मिल गया था। उन्होंने खून दिया। लगभग दो घण्टे बाद यतीश के ओठ हिले, आंखे खुली। उसके मुह से दो शब्द निकले। पहले मम्मी और फिर… रोहित…।

रोहित को यतीश के सामने लाया गया। उसकी आवाज बहुत धीमी थी। यतीश रोहित से बोला- मेरी मम्मी के पास चले जाओ। तुमने बताया था न, उनकी तबियत खराब हो गई है। उनका ख्याल रखना। उनको मत बताना कि मेरा एक्सीडेंट हो गया है।

रोहित के मुख से बोल नहीं फूट रहे थे। वह ठठारे मारकर रो पड़ा। पश्चाताप की अग्नि उसे जला रही थी। पश्चाताप ! हां पश्चाताप ! किसी की भावनाओं से खिलवाड़ करने का पश्चाताप । झूठ बोलकर किसी को संकट में डाल देने का पश्चाताप, जिसे रोहित के सिवाय और कोई नहीं जानता था ।

यह तो एप्रिल फूलथा। रोहित का निराला ऐप्रिल फूल। यतीश से चुपके से यह कहकर कि तुम्हारी मम्मी बीमार हो गई है, रोहित ने ऐप्रिल फूल ही तो मनाना चाहा था। ऐसे मनता है ऐप्रिल फूल? उसके झूँठ से कितनी चोट आई थी यतीश को। जब उसकी मम्मी जानेगी तो उन्हें कितना कष्ट होगा।

रोहित के ओठ कंपकपाए। उसने सच उगल दिया-’यतीश मम्मी की चिंता न करो। वे ठीक हैं। बिल्कुल ठीक। मैंने एप्रिल फूल के नाम पर तुमसे झूठ बोला था। …तुम मुझे …माफ़ तो नहीं करोगे न ?’

सच कह रहे हो न ?’ यतीश अपनी चोट को भूलकर जैसे एकदम चहक=सा उठा। उसने रोहित को मन ही मन माफ भी कर दिया। कहा, जो हुआ सो हुआ लेकिन अब तुम्हारे इस सच से मुझे बड़ी तसल्ली मिल रही है।

इस घटना को कई साल बीत चुके हैं। यतीश की चोट तो एक दो महीने में ठीक हो गई थी लेकिन एक भारी बोझ, जो रोहित के मन पर कल भी था, आज भी ज्यों का त्यों है। एप्रिल फूल आता है तो यह बोझ उसके मन को और अधिक पश्चाताप से भर देता है। वह बच्चों को समझाता फिरता है, एप्रिल फूल मनाओ लेकिन मेरी तरह  … कभी भी नहीं। वह यतीश से जब भी मिलता है तो पूछता है, तुमने मुझे माफ़ तो कर दिया है न…?

Leave a Reply

Your email address will not be published.