मेरा परिवार (हिन्दी भाषामा बालकथा)

कथा साहित्य हिन्दी
  • अनिल जायसवाल, सिनियर कपी एडिटर- हिन्दुस्तान टाइम्स

“रमन जल्दी करो। ट्रेन का समय हो रहा है।”

रजनीश ने आवाज लगाई, तो रमन ने बेमन से अपना बैक-पैक टांगा और बाहर आ गया। देखा, पापा टैक्सी में सामान रख चुके थे। इसकी मम्मी सुरेखा और छोटी बहन डिम्पल गाड़ी में बैठकर उसका इंतजार कर रही थीं। रमन टैक्सी में बैठा, तो रजनीश ने घर में ताला लगाया और टैक्सी में आगे की सीट पर बैठ गए। गाड़ी स्टेशन की तरह चल पड़ी।दस साल का रमन दिल्ली के एक बढ़िया सोसाइटी में रहता था। उसके पापा रजनीश डाक्टर थे। मम्मी सुरेखा साफ्टवेयर इंजीनियर थीं। कई साल शहर में रहने के बावजूद रजनीश का अपने गांव से बहुत लगाव था। जब भी मौका मिलता, वह गांव जाने को तैयार रहते थे। इस बार उनकी भतीजी की शादी थी, तो वह ऐसा मौका कब छोड़ सकते थे।

पर रमन की बात कुछ और थी। वह शहर में पला-बढ़ा था। उसे एसी, कंप्यूटर के साथ रहने की आदत थी, इसलिए उसी गांव जाना पसंद न था। पिछले तीन साल से उसे दिल्ली में छोड़कर रजनीश अकेले ही गांव जा रहे थे, पर इस बार तो बड़ा पारिवारिक उत्सव था,तो रमन को वह कैसे न ले जाते।ट्रेन चल पड़ी, पर रमन अनमना सा बैठा था। रजनीश सब समझ रहे थे। कुछ सोचकर वह रमन के पास बैठ गए। फिर बोले, “मेरा बेटा क्या सोच रहा है?”“पापा, मुझे गांव और गांव के लोग पसंद नहीं।” रमन के दिल की बात उसके मुंह पर आ गई।

“ओह, मतलब तुम्हें दादा-दादी भी पसंद नहीं। चलो आज से वे केवल डिम्पल के दादा-दादी होंगे।” रजनीश कहते हुए मुसकराए।“मैंने ऐसा कब कहा। वे मुझे बहुत पसंद हैं। पर गांव मुझे पसंद नहीं।”“ठीक है। इस बार खुश मन से गांव चलो। अगर इस बार तुम्हें गांव पसंद नहीं आया, तो अगली बार से मैं भी गांव नहीं आऊंगा।” रजनीश उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले।

“प्रामिस?” रमन खुश होकर बोला।

“प्रामिस।” रजनीश हंसते हुए बोले, “तुमने न्यूक्लियर फैमिली के बारे में पढ़ा था न। मुझे फिर से बताओ।”

“आजकल न्यूक्लियर फैमिली का रिवाज है, जिसमें आमतौर पर माता-पिता और उनके बच्चे होते हैं। बल्कि अब तो एक ही बच्चा होता है। जबकि जाइंट फैमिली में बहुत लोग होते हैं।” रमन ने रटा हुआ बोल दिया।

“ जाइंट फैमिली में कौन-कौन लोग होते हैं?” रजनीश कहते हुए मुसकराए।

“दादा-दादी, चाचा-चाची और, और…” रमन अटक गया।

“हमारी फैमिली कौन सी फैमिली है?” रजनीश ने पूछा।

“हम न्यूक्लियर फैमिली हैं।” रमन ने गर्व से जवाब दिया।

“और इस बार हम गांव नहीं, जाइंट फैमिली में जा रहे हैं। जरा ध्यान से सबको पहचानना। तुम्हारी पढ़ाई में भी काम आएगा यह ट्रिप।” रजनीश बड़ा प्यार से बोले।रात हो गई थी, सब सो गए। पर रमन जाइंट फैमिली के बारे में सोचता रहा।अगले दिन तड़के ही गाड़ी गांव के स्टेशन पर रुकी। डिब्बे से बाहर आते ही प्लेटफार्म पर रमन को भारी भीड़ दिखाई दी। उसने अचरज से पापा की ओर देखकर पूछा, “पापा, यहां इतनी भीड़?”

रजनीश ने कुछ जवाब नहीं दिया। बस आगे बढ़कर सामने खड़े एक बुजुर्ग के पैर छू लिए और वोले, “ये तुम्हारे छोटे दादा जी हैं और बाकी भी भीड़ नहीं हमारे रिश्तेदार हैं, जो हमें लेने स्टेशन तक आए हैं।”

शहर में रमन जितने लोगों को जानता था, उनसे ज्यादा तो उसके रिश्तेदार यहां जमा थे। तभी एक पहलवान टाइप लड़के ने रमन को गोद में उठाकर अपने कंधे पर बिठा लिया और बोला, “मेरा शहरी छोटा भाई पैदल नहीं मेरे कंधे पर बैठकर घर पहुंचेगा।”

रमन को शर्म आ रही थी, पर वह चुपचाप बैठा रहा। हुजूम जब पुश्तैनी घर पहुंचा तो वहां हल्ला ही मच गया। सब आ-आकर उनसे मिलने लगे। दादा-दादी ने रमन और डिम्पल को खूब प्यार किया। लोगों को इतना प्यार पाकर रमन को बड़ा अच्छा लग रहा था। रमन की बुआ आई तो ने उसने प्रणाम नहीं किया। रजनीश बोले, “बेटा , ये मेरी बहन और तुम्हारी बुआ हैं।”

“अच्छा आंटी हैं।” कहते हुए रमन ने नमस्कार किया।

“न बेटा, आंटी में तो सब रिश्ते आ जाते हैं। हमारे भारतीय समाज में सबकी अलग पहचान है। मैं तुम्हारे पापा की बहन तो बुआ और ये तुम्हारे चाचा की पत्नी तो तुम्हारी चाची। और हां तुम्हारी मम्मी की बहन तुम्हारी मौसी हुईं, पर अंग्रेजी में सब आंटी हैं।” बुआ ने प्यार से समझाया , तो कुछ-कुछ रमन की समझ में आया।

थोड़ी देर में ही रमन पूरे घर का चहेता बन गया था। उसके कई हमउम्र भाई-बहन थे। सबका एक ग्रुप बन गया। उधर उसके पापा खुद बच्चे बनकर पूरे घर में सबसे मिल रहे थे। उन्हें देखकर कहना मुश्किल था कि वह इतने बड़े डाक्टर हैं।शाम हुई, तो रमन ने मम्मी का मोबाइल से लिया। उसका अपने दोस्तों के साथ आनलाइन गेम खेलने का समय हो गया था। दादा जी ने देखा तो बोले, “बेटा मोबाइल पर तो गेम खेलते रहते हो। गांव में आए हो तो यहां घुमो फिरो। तुम्हें मजा आएगा।”दादा जी की बात मानकर रमन ने मोबाइल छोड़ दिया और अपने कजंस के साथ खेतों की ओर निकल पड़ा। थोड़ी दूर पर उनके दादा जी का केलों का बगीचा था। उसने पहली बार पेड़े पर केले देखे थे। वह अचरज से केलों को छू रहा था। तभी उसका चचेरा भाई अमित बोला, “रमन, चलो, आगे नदी है। वहां नहाने चलते हैं।”बाकी बच्चों ने हां का हुंकार लगाया, पर रमन ने मना कर दिया। बोला, “नहीं यह डेंजरस है।”

तभी पीछे से रजनीश आ गए। बच्चों की बात सुनकर बोले, “रमन ठीक कहता है। अकेले बच्चों को नदी में नहीं नहाना चाहिए। बड़ों का साथ होना चाहिए। चलों मैं भी साथ चलता हूं।”

रजनीश के साथ बच्चों ने खूब मस्ती की। इतना मजा रमन को कभी नहीं आया था। रात हुई, तो बच्चों ने प्रोग्राम बनाया कि छत पर सोया जाए। सब आनाकानी करने लगे तो दादा जी बोले, “बच्चों को छत पर सोने दो। आज मैं भी उनके साथ छत पर सो जाता हूं।”

बच्चों की टोली छत पर पहुंची। खुला आसमान, टिमिटमाते तारे, सब रमन को स्वप्न लोक जैसा लग रहा था। दादा जी बच्चों से पूछने लगे, “कैसा लग रहा है गांव?”“बढ़ाया दादा जी। अमेजिंग जाइंट फैमिली।” रमन ने खुश होकर जवाब दिया।“बेटा, फैमिली और केयरिंग दोनों को मैं एक ही शब्द मानता हूं।”

“वो कैसे दादा जी?” रमन ने पूछा।

“फैमिली हमें केयर करना सिखाती है। हम एक-दूसरे का ध्यान रखते हैं। अब देखो, कल तुम्ही चचेरी बहन की शादी है, तो सारे फेमिली वाले कई दिन से इकट्ठे हैं। अच्छा रमन तुम शहर में ऐसे शादी में कभी शामिल हुए हो?” दादा जी ने पूछा।“नहीं दादा जी। वहां तो हम खाने के आसपास ही पहुंचते हैं।” रमन बोला।“यही तो है। फेमिली वाले कभी एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ते। तुम्हारे पापा और चाचा की एक कहानी सुनाता हूं।”

“अरे वाह। सुनाइए दादा जी।” रमन खुश होकर बोला।

“तुम्हारे पिता जी पढ़ने में शुरु से तेज थे। पर तुम्हारे चाचा जी का मन पढ़ने में नहीं लगता था। एक दिन क्लास में टीचर ने तुम्हारे चाचा से कह दिया, “तुम दसवीं पास नहीं कर पाओगे।”

तुम्हारे चाचा रोते हुए घर लौटे। तुम्हारे पापा ने सुना तो उन्होंने घोषणा कर दी, “मेरा भाई अच्छे नंबरों से पास होगा, नहीं तो मैं भी पढ़ाई छोड़ दूंगा।

”उस दिन से तुम्हारे पापा तुम्हारे चाचा को खुद पढ़ाने लगे। तुम्हारे चाचा को लगा कि वह ठीक से नहीं पढ़ेंगे तो उसका बड़ा भाई अपनी डाक्टरी की पढ़ाई छोड़ देगा। इसलिए तुम्हारे चाचा मन लगाकर पढ़ने लगे। आखिर दसवीं में तुम्हारे चाचा फर्स्ट क्लास से पास हुए।”

“सच।” रमन खुशी से बोला।“

हां। और पता है, तुम्हारे चाचा के शिक्षक ने तुम्हारे चाचा के पास न होने की घोषणा तुम्हारे पापा के कहने पर की थी।”

“ऐसा क्यों?” रमन ने अचकचाकर पूछा।

“तुम्हारे पापा जानते थे कि तुम्हारे चाचा उन्हें बहुत प्यार करते हैं। इसलिए उन्होंने तुम्हारे चाचा को मोटिवेट करने के लिए यह इमोशनल चाल चली।” कहते हुए दादाजी का चेहरा गर्व से फूल गया।

रमन का भी अपने पापा की तारीफ सुनकर अच्छा लगा।

वह बोला, “मैं भी अपनी बहन का खूब ध्यान रखूंगा।” रात बहुत हो चुकी थी। सब सो गए।

अगले दिन शादी थी। अब तो रमन को भी सबके साथ काम करना अच्छा लह रहा था। वह भी भाग-भागकर सबके काम में हाथ बंटा रहा था। उसमें आए बदलाव को रजनीश महसूस कर रहे थे। रात हुई तो बरात आ गई। लड़की के भाई के रूप में अपने जीजा का स्वागत करने रमन भी गया। उसे बड़ा अच्छा लगा जीजा से मिलकर। वर माला के बाद अचानक लड़कियों में कानाफूसी शुरु हो गई, “जीजा जी के जूते कहां हैं? हमें चुराने हैं।”

अब जूते की ढ़ूंढ़ाई शुरु हो गई। जीजा जी बोले, “जिसने जूते चुराए हैं, वह अब दे दो और नेग ले लो।

”लड़कियां रोंआसा होकर बोलीं, “हम तो चुराने को तैयार बैठी थीं। पर पता नहीं कौन ले गया।?”

“जूते इधर हैं।” तभी आवाज आई। सबने देखा, एक डिब्बे में जूते लेकर डिम्पल खड़ी थी, साथ में था मुसकराता हुआ रमन।“

अरे वाह। आज तो मेरे पोते ने कमाल कर दिया।” दादा जी खुश होकर बोले।जीजा जी ने रमन को नेग देकर जूते ले लिए। सारा पैसा रमन को मिला देखकर बाकी लड़कियों को चेहरा उतर गया। रमन मुसकराता हुआ उनके पास पहुंचा और बोला, “यह पैसा सबका है। हम सब एक परिवार हैं।”

उसकी कजिन खुशी से उसके गले लग गईं। रजनीश दूर से यह सब देखकर खुश हो रहे थे। उनकी नजर जब रमन से मिली तो लगा जैसे रमन कह रहा हो, “थैक्यू पापा। फैमिली वैल्यूज सिखाने के लिए।”

ईमेल: akjaiswal2592@gmail.com

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