अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन’

मार्च 1974 से अपनी पहली बाल कविता ‘होली आई’ के माध्यम से बालसाहित्य के क्षेत्र में दस्तक देनेवाले चमन जी को पचास वर्ष का सक्रिय साहित्यिक अनुभव है। कहानी, कविता और नाटक विधाओं के माध्यम से उन्होंने अपनी उत्तम लेखनी का परिचय दिया है।

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डा. नागेश पाण्डेय ‘संजय’ का टेढ़ा पुल

‘टेढ़ा पुल’ वरिष्ठ बाल साहित्यकार, डा. नागेश पांडेय ‘संजय’ का वर्ष २०१५ में प्रकाशित बाल उपन्यास है जिसके प्रकाशक विभा प्रकाशन, इलाहाबाद हैं । पुस्तक का आकर्षक मुखपृष्ठ रंगीन एवं भीतर के सभी चित्र श्वेत-श्याम हैं जिनका चित्रांकन मो. शोयेब फराज द्वारा किया गया है ।

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ईश्वर से भेंट    

एक छोटा सा बच्चा था। उसकी उम्र थी सिर्फ ७ साल, पर गम्भीरता इतनी कि १७ साल के बच्चे को भी मात कर जाए। एक दिन उसने अपनी मां से पूछा, ”मां, क्या हम भगवान से मिल सकते हैं ?”
बच्चे की बात सुनकर मां हैरान रह गयी। उसने बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ”हां बेटा, जिस दिन तुम सच्चे मन से ईश्वर की खोज करोगे, उस दिन वे तुमसे मिलने ज़रूर आएंगे।”

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आदमी का कीमत

एक बार की बात है। महात्मा बुद्ध प्रवचन दे रहे थे। प्रवचन में आसपास के बहुत से लोग शामिल थे। सभी लोग ध्यान से बुद्ध को सुन रहे थे। कुछ देर में प्रवचन समाप्त हो गया। लोगों ने बुद्ध को प्रणाम किया और अपने-अपने घर को चल पड़े।
पर एक युवक वहां पर बैठा रह गया। बुद्ध की नज़र उस युवक पर पड़ी, तो वे पूछ बैठे, ”क्या बात है, वत्स? कोई जिज्ञासा है क्या?”

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मेरा परिवार (हिन्दी भाषामा बालकथा)

रजनीश ने आवाज लगाई, तो रमन ने बेमन से अपना बैक-पैक टांगा और बाहर आ गया। देखा, पापा टैक्सी में सामान रख चुके थे। इसकी मम्मी सुरेखा और छोटी बहन डिम्पल गाड़ी में बैठकर उसका इंतजार कर रही थीं। रमन टैक्सी में बैठा, तो रजनीश ने घर में ताला लगाया और टैक्सी में आगे की सीट पर बैठ गए। गाड़ी स्टेशन की तरह चल पड़ी।

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यह क्या हो गया ? (हिन्दी भाषामा किशोर कथा)

मैं गांव से आ रहा हूं । तुम्हारी मम्मी की तबियत एकदम खराब हो गई है।’ रोहित ने गम्भीर मुद्रा में, कालेज फील्ड में खड़े यतीश के कंधे पर हाथ रखकर कहा। यतीश का खिलखिलाता चेहरा मुरझा-सा गया ।

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कासाङ (हिन्दी भाषामा बालकथा) – विजय चालिसे

“आज दूकान का सामान लाना ही पड़ेगा, आज ही अतिथि भी अधिक आने बाले हैं, क्या करुँ ।” माँ पड़ोस की दादी से अपनी समस्या बता रही थी ।
“पता नहीं कैसे सम्हालती हो अकेले सुवह की धूप सेकती सब्जी काटने में सहयोग करते हुए दादी ने कहा ।
कासाङ की माँ मुक्तिनाथ धाम जानेवाले अतिथियों के लिए रहने का छोटा सा लज चलाती थी । यह झरकोट गाँव बहुत ही सुन्दर था । बाबा विदेशी अतिथियों को लाने पोखरा गए हुए थे । घर में माँ और कासाङ थे । जोमसोम में कालेज न होने के कारण उसका बड़ाभाई पोखरा में ही रहकर पढ़ता था ।

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