मेरा परिवार (हिन्दी भाषामा बालकथा)

रजनीश ने आवाज लगाई, तो रमन ने बेमन से अपना बैक-पैक टांगा और बाहर आ गया। देखा, पापा टैक्सी में सामान रख चुके थे। इसकी मम्मी सुरेखा और छोटी बहन डिम्पल गाड़ी में बैठकर उसका इंतजार कर रही थीं। रमन टैक्सी में बैठा, तो रजनीश ने घर में ताला लगाया और टैक्सी में आगे की सीट पर बैठ गए। गाड़ी स्टेशन की तरह चल पड़ी।

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यह क्या हो गया ? (हिन्दी भाषामा किशोर कथा)

मैं गांव से आ रहा हूं । तुम्हारी मम्मी की तबियत एकदम खराब हो गई है।’ रोहित ने गम्भीर मुद्रा में, कालेज फील्ड में खड़े यतीश के कंधे पर हाथ रखकर कहा। यतीश का खिलखिलाता चेहरा मुरझा-सा गया ।

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कासाङ (हिन्दी भाषामा बालकथा) – विजय चालिसे

“आज दूकान का सामान लाना ही पड़ेगा, आज ही अतिथि भी अधिक आने बाले हैं, क्या करुँ ।” माँ पड़ोस की दादी से अपनी समस्या बता रही थी ।
“पता नहीं कैसे सम्हालती हो अकेले सुवह की धूप सेकती सब्जी काटने में सहयोग करते हुए दादी ने कहा ।
कासाङ की माँ मुक्तिनाथ धाम जानेवाले अतिथियों के लिए रहने का छोटा सा लज चलाती थी । यह झरकोट गाँव बहुत ही सुन्दर था । बाबा विदेशी अतिथियों को लाने पोखरा गए हुए थे । घर में माँ और कासाङ थे । जोमसोम में कालेज न होने के कारण उसका बड़ाभाई पोखरा में ही रहकर पढ़ता था ।

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